आशिकी

दिलकी आवाज जब सिहाई में आती है तो शायरी बनती है;

मगर दिलकी आवाज जब जुबान पर आति है तो वो आशिकी बन जाती है ||

– निसर्ग

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जाने क्यूँ?

में और तू, आखिर यूँ ,
मिल ही गए , फिर से यूँ,
इतने नजदीक होके भी,
हम तुम दूर है क्यूँ?
जाने क्यूँ , जाने क्यूँ?
सिर्फ तू है और मैं हूँ,
फिर ये बिचका पर्दा क्यूँ?
जैसे  नदी के दो किनारे यूँ ,
इतने पास हो कर भी दूर है क्यूँ?
तू मुझमें है, में तुझमें हूँ,
फिर इस झमाने की फ़िक्र क्यूँ?
जाने क्यूँ, जाने क्यूँ?
तुम हो, में हूँ और ख्वाहिशे है,
तो मंजिल का इन्तेझार क्यूँ?
राग है, रागिनी भी है,
फिर कोई धून की जरुरत क्यूँ?
जाने क्यूँ, जाने क्यूँ?
– निसर्ग