सुखी ज़मीन…

रास्तोकी दूरियां रिश्तोंकी नज़दीकियां बन गई,
यादोंकी कश्तियाँ तन्हाइयो का ज़ेवर बन गई,
सिरहानेकी गर्मी में आपकी साँसों को ढूंढ़ता हुँ,
ठंडी और गर्मी तो गुज़र गई,
सीनेमें छिपी बारिश की बौछार के लिए सुखी ज़मीन ढूंढ़ता हुँ ॥

-निसर्ग

खुश्बु

मैं साया नहीं जो छोड के चला जाऊँगा,
मैं हवा का झोंका नहीं जो आके लौट जाऊँगा,
मैं तो खुश्बु हूँ तेरे बदन की, तेरी चिता के साथ ही जल जाऊँगा ।।

-निसर्ग

बात बन जाती है…

किसीकी याद रह जाती है, किसीकी चाहत मिल जाति है…

जिन्दगि की राह मे कई वादियाँ गुज़र जाती है…

हर वादी में खुदको नया पाता हूँ ,

बेगाने अपने हो जाते है और बात बन जाती है…

– निसर्ग

तरस …!!!

हम तो करते है बारिश का इंतज़ार,

क्योंकि इसी बहाने कोई देता है हमको पुकार,

अरे ओ बारिश अब तो जम के बरस,

हमें भी लगती है यार के आवाज़ की तरस !!!!

– निसर्ग