तेरी बाहों के शामिआने में डूब जाने को जी करता है,
तेरे बदनकी खुशबु में बह जाने को जी करता है,
तेरी गर्म सांसो में जल जाने को जी करता है,
मेरी खामोश निगाहें ढूंढ रही है तुझे,
आज फिर प्यार की सुर्खियो में गुम हो जाने को जी करता है …
- निसर्ग
तेरी बाहों के शामिआने में डूब जाने को जी करता है,
तेरे बदनकी खुशबु में बह जाने को जी करता है,
तेरी गर्म सांसो में जल जाने को जी करता है,
मेरी खामोश निगाहें ढूंढ रही है तुझे,
आज फिर प्यार की सुर्खियो में गुम हो जाने को जी करता है …
- निसर्ग
ભાઈ કોઈ સમજાવશે જીંદગી શું છે?
ડુંગળીના છોડા છે કે ફુલેવરની ભૂલ ભુલૈયા?
જેટલા છોડા કાઢું એટલા રહસ્યો નીકળે છે..
જેટલા અંદર પડીએ એટલા રસ્તા મળે છે..
ભીંડા જેવી ચીકણી છે કે મરચા જેવી તીખી?
જેટલી કાપુ એટલી સરકી જાય છે,
જેટલા હાથ ધોવું એટલી આંખે લાગે છે,
સક્કારીયા જેવી મીઠી છે કે કરેલા જેવી કડવી?
સુખમાં સારું સારું લાગે છે,
ને દુઃખમાં ભૂલી જવા જેવું લાગે છે..
અરે ભાઈ આતો મિક્ષ સબ્જી છે,
જેને જે સ્વાદ ગમતો હોય એ સમજી ને ખાય …..
- નિસર્ગ
तुम दूर क्यूँ हो, मेरे पास क्यों नहीं…
मेरी खामोश सांसे तुजको मिलती क्यों नहीं,
ऐसी कोई भूल मुझसे हुई तो नहीं,
तुम दूर क्यूँ हो, मेरे पास क्यों नहीं…
क्यों दुश्मन जमाना दिवार है बना,
क्यों आज फिर तेरी जुदाई में दिन है ढला,
तेरी सांसो की खुशबु फिर मैंने जानी है,
तुम दूर क्यूँ हो, मेरे पास क्यों नहीं…
होता है ये प्यार तो दुरिया क्यों है,
रातो की वीरानियों में अँधेरा क्यों है,
आज फिर अंधेरो में तेरी परछाई देखि है,
तुम दूर क्यूँ हो, मेरे पास क्यों नहीं…
बूझो तो जाने ये तन्हाई क्या है,
सुलगती आग में अंगारे क्या है,
सहर की किरणों में तेरा दीदार है पाया,
तुम दूर क्यूँ हो, मेरे पास क्यों नहीं…
-Nisarg
सूरज क्षितिज पे जा रहा है,
रात का साया एक बार फिर दिन पे आया है …
आज चाँद ने मेरी खिड़की पे दस्तक दी है,
इस चाँद को देख खुद मेरा चाँद शरमाया है …
-निसर्ग
दिल को आरजू मिली है होने पे फनाह तेरे,
आँखों को नज़र मिली है देखने को चेहरा तेरे,
लगा लूँगा तेरे होठो की मुस्कान मेरे होठों पे,
छुपा लूँगा मेरी पलकों को तेरे गर्दन के साये में,
लिख दूंगा तेरा नाम बादल के सिने पे,
फैला दूंगा तेरी सांसो की ख्श्बू बहती हवाओ में,
दिल को आरजू मिली है होने पे फनाह तेरे …
- Nisarg
हर बात में जिक्र है तेरा,
हर महफ़िल में इत्र है तेरा..
एक उम्र गुजरी है तेरे इंतज़ार की गलियो में,
इम्तिहान मत ले अब तू मेरे सब्र का..
-निसर्ग
तेरी सांसो की खुशबु चुराली है मोगरे ने,
तेरे होठों की पंखडी लगा ली है गुलाब ने..
अब क्यूँ दू तुझे गुलाब ,
क्यूँ सजाऊ तुझको गजरे से ,
जो खुद में पूरा बागीचा समाये हुए है…
- निसर्ग
दर-ओ-दिवार पे मेरी ऑंखें टिकी हुई है,
जहन में मेरे कसक सी मची हुई है …
क्या कहू तुझे ओ जान-ऐ-सितम,
तुने मेरे दिल पे यादों की लकीर खिंची हुई है …
- निसर्ग
जबसे देखा है तुजको,
बिता रहा हूँ जिंदगी मदहोशी में …
अंजान है इन रास्तो की गलिया ,
चला जा रहा हूँ में मदहोशी में …
गुजर रहे है दिन मैखाने में,
भरे जा रहा हूँ पैमाने मदहोशी में…
- निसर्ग